जैसलमेर की राजकुमारी

प्रकार : –कहानी
पात्र :- 1.रतनसिंह
2.रत्नावती
3.मलिक काफूर
4.अलाउद्दीन
5.राजपूत योद्धा
6.शत्रु सैनिक

मुख्य कहानी

राजकुमारी ने हँसकर कहा- ‘पिताजी, दुर्ग की चिंता मत कीजिए। जब तक उसका एक भी पत्थर पत्थर से मिला है, उसकी रक्षा मैं करूँगी। अलाउद्दीन कितनी ही वीरता से हमारे दुर्ग पर आक्रमण क्यों न करें, आप निर्भय होकर शत्रु से लोहा ले।’

यह जैसलमेर के राठौड़ दुर्गाधिपति महाराव रतनसिंह की कन्या थी। इस समय बलिष्ठ अरबी घोड़े पर चढ़ी हुई थी और मर्दानी पोशाक पहने थी। उसके कमर में दो तलवारें लटक रही थी। कमरबंद में पेशकब्ज, पीठ पर तरकस और हाथ में धनुष था। वह चपल घोड़े की रास को बलपूर्वक खींच रही थी, जो एक क्षण भी स्थिर रहना नहीं चाहता था। रतनसिंह जरहबख्तर पहने एक हाथी के फौलादी होदे पर बैठे आक्रमण के लिए प्रस्थान कर रहे थे। सामने राजपूत सवार नंगी तलवारें लिए मैदान में खड़े थे। उनके घोड़े हिनहिना रहे थे और शस्त्र झनझना रहे थे।

रतन सिंह ने पुत्री के कंधे पर हाथ रख कर कहा- “बेटी, तुझसे मुझे ऐसी ही आशा है। मैंने तुझे पुत्री- नहीं पुत्र की भांति पाला और शिक्षा दी है। मैं दुर्ग को तुझे सौंप कर निश्चिंत हो रहा हूं। सावधान रहना शत्रु वीर ही नही, धूर्त और छलिया है।”

बालिका ने वक्र दृष्टि से पिता को देखा और हंसकर कहा- “नहीं, पिता जी! आप निश्चिंत होकर प्रस्थान करें।”

रतन सिंह ने एक तीव्र दृष्टि अपने किले के धूप से चमकते हुए कंगूरों पर डाली और हाथी बढ़ाया। गगनभेदी जय-निनाद से धरती-आसमान कांप उठे।  एक विशालकाय अजगर की भांति सेना किले के फाटक से निकलकर पर्वत की उपत्यका में विलीन हो गई। इसके बाद घोर चीत्कार करके दुर्ग का फाटक बंद हो गया। टिड्डीदल की भांति शत्रु ने दुर्ग को घेर रखा था। सब प्रकार की रसद बाहर से आनी बंद थी। प्रतिदिन शत्रु गोलियों और तीरों की वर्षा करता था; पर जैसलमेर का अजेय दुर्ग गर्व से मस्तक उठाए खड़ा था। शत्रु समझ गए थे कि दुर्ग विजय करना हंसी ठठ्ठा नहीं है। दुर्ग रक्षिणी राजनंदिनी रत्नावती निर्भय अपने दुर्ग में सुरक्षित बैठी शत्रुओं के दांत खट्टे कर रही थी। उसकी अधीनता में पुराने विश्वस्त राजपूत वीर थे, जो मृत्यु और जीवन को खेल समझते थे। वह अपनी सखियों समेत दुर्ग के किसी बुर्ज पर चढ़ जाती और शत्रु-सेना का ठठ्ठा उड़ाती हुई वहां से सनसनाते तीरों की वर्षा करती। वह कहती- “मैं स्त्री हूं पर अबला नहीं। मुझ में मर्दों जैसा साहस और बल है।”

उसकी बातें सुनकर सहेलिया ठह ठहाकार हंस देती थीं। प्रबल शत्रु दल द्वारा आक्रांत दुर्ग में बैठना राजकुमारी के लिए एक विनोद था।

मलिक काफूर एक गुलाम था जो इस समय शत्रु सेना का अधिपति था। वह दृढ़ता और शांति से राजकुमारी की चोटें सह रहा था। उसने सोचा था कि जब किले में खाद्य पदार्थ कम हो जाएंगे, दुर्ग वश में आ जाएगा। फिर भी वह समय समय पर आक्रमण कर देता था। परंतु दुर्ग की दीवारों और चट्टानों को कोई क्षति नहीं पहुंचती थी। राजकुमारी बहुधा दुर्ग पर से कहती यह धूर्त्त गर्द उड़ा कर गोलियों की वर्षा कर मेरे किले को गंदा और मैला कर रहे हैं। इससे क्या लाभ ?

शत्रु दल ने एक बार दुर्ग पर आक्रमण किया। राजकुमारी चुपचाप बैठी रही। जब शत्रु आधी दूरी तक दीवारों पर चढ़ आए, तो भारी-भारी पत्थरों के ढोंके और गरम तेल की वह मार पड़ी कि शत्रु-सेना छिन्न भिन्न हो गयी। लोगों के मुंह झुलस गए। कितनों की चटनी बन गई। हजारों शत्रु सैनिक तौबा-तौबा कर के प्राण लेकर भागे। जो प्राचीर तक पहुंचे, मौत के घाट उतार दिया गया।

सूर्य छुप रहा था। प्राची दिशा लाल-लाल हो रही थी। राजकुमारी कुछ चिंतित भाव से अति दूर पर्वत की उपत्यका में सूर्य को डूबते हुए देख रही थी। उसे चार दिन से पिता का संदेश नहीं मिला था। वह सोच रही थी कि इस समय पिता को क्या सहायता दी जा सकती है। वह एक बुर्ज के नीचे बैठ गई। धीरे-धीरे अंधकार बढ़ने लगा। उसने देखा- एक काली मूर्ति धीरे-धीरे पर्वत की तंग राह से किले की ओर अग्रसर हो रही है। उसने समझा कि पिता का संदेश वाहक होगा। वह चुपचाप उत्सुक होकर उधर ही देखती रही। उसे आश्चर्य हुआ जब उसने देखा कि वह गुप्तद्वार की ओर न जाकर सिंह द्वार की ओर जा रहा है। तब अवश्य शत्रु है। राजकुमारी ने एक तीक्ष्ण बाण अपने हाथ में लिया और छिपती हुई उस मूर्ति के साथ ही द्वार की पौर के ऊपर आ गयी। वह मूर्ति एक गठरी को पीठ से उतार कर प्राचीर पर चढ़ने का उपाय सोच रही थी। राजकुमारी ने धनुष पर बाण चढ़ाकर ललकार कर कहा- वही खड़ा रह और अपना अभिप्राय बता।

कालरूप राजकुमारी को सम्मुख देख, व्यक्ति भयभीत स्वर में बोला- मुझे किले में आने दीजिए, बहुत जरूरी संदेश है।

“वह सन्देश वहीं से कह।”

“वह अतिशय गोपनीय है।”

“कुछ चिंता नहीं, कह।”

“मैं किले में आकर कहूँगा।”

“उससे पूर्व यह तीर तेरे कलेजे के पार हो जायेगा।”

“महाराज विपत्ति में है। में उनका चर हूँ।”

“चिट्ठी हो तो फेंक दे।”

“जबानी कहना है।”

“जल्दी कह।”

“यहाँ से नहीं कह सकता।”

“तब ले।” इतना कहकर राजकुमारी ने तीर छोड़ दिया। वह उसके कलेजे को पार करता हुआ निकल गया। राजकुमारी ने सिटी दी। दो सैनिक आ हाजिर हुए। कुमारी की आज्ञा पा रस्सी के सहारे उन्होंने नीचे जा, मृत व्यक्ति को देखा- शत्रु था। दूसरा व्यक्ति पीठ पर गठरी में बंधा था। यह देख राजकुमारी जोर से हंस पड़ी। इसके बाद वह प्रत्येक बुर्ज पर घूम-घूम कर प्रबंध और पहरे का निरीक्षण करने लगी। पश्चिमी फाटक पर जाकर उसने देखा- द्वार रक्षक द्वार पर नहीं था। कुमारी ने पुकार कर कहा- यहां पहरेदार कौन है ?

एक वृद्ध योद्धा ने आगे बढ़कर कुमारी को मुजरा किया। उसने धीरे-धीरे कुमारी के कान में कुछ और भी कहा। वह हँसती-हँसती बोली- ’ऐसा, ऐसा ? अच्छा, वे तुम्हें घूंस देंगे, बाबा जी साहब ?’

‘हां बेटी!’ कह कर बूढ़ा योद्धा तनिक हंस दिया। उसने गाँठ से सोने की पोटली निकालकर कहा- ‘यह देखो, इतना सोना है।

‘अच्छी बात है। ठहरो, हम उन्हें पागल बना देंगे। बाबाजी, तुम आधी रात को उनकी इच्छानुसार द्वार खोल देना।’

वृद्ध भी हँसता और सिर हिलाता हुआ चला गया।

बारह बज गए थे। चांदनी छिटक रही थी। कुछ आदमी दुर्ग की ओर छिपे-छिपे आ रहे थे। उनका सरदार काफूर था। उनके पीछे सौ चुने हुए योद्धा थे। संकेत पाते ही द्वारपाल ने प्रतिज्ञा पूरी की। विशाल महराबदार फाटक खुल गया। सौ व्यक्ति चुपचाप दुर्ग में घुस गए। काफूर ने मंद स्वर में कहा- ‘यहां तक तो ठीक हुआ। अब हमें उस गुप्त मार्ग से दुर्ग के भीतर महलों में पहुंचा दो, जिसका तुमने वादा किया है।’

राजपूत ने कहा- मैं वादे का पक्का हूँ, मगर बाकी सोना तो दो।’ सेनापति ने मुहरों की थैली हाथ में रख दी। राजपूत फाटक में ताला बंद कर चुपचाप प्राचीर की छाया में चला और लोमड़ी की भांति चक्कर खा कर कहीं गायब हो गया।

सैनिक चक्रव्यूह में फँस गये, न पीछे का रास्ता मिलता था, न आगे का। वे वास्तव में कैद हो गए थे और अपनी मूर्खता पर पछता रहे थे। मलिक काफूर दांत पीस रहा था। राजकुमारी की सहेलियां इतने चूहों को चूहेदानी में फंसा कर हँस रही थी।

शत्रु-सैन्य ने दुर्ग पर भारी घेरा डाल रखा था। खाद्य सामग्री धीरे-धीरे कम हो रही थी। घेरे के बीच से किसी का आना अशक्य था। राजपूत भूखे मर रहे थे। राजकुमारी का शरीर पीला हो गया था, उसके अंग शिथिल हो गए थे। पर नेत्रों का तेज वैसा ही था। उसे कैदियों के भोजन की बड़ी चिंता थी। किले का प्रत्येक आदमी उसे देवी की भांति पूजता था। उसने मलिक काफूर के पास जाकर कहा- ‘सेनापति, मुझे तुमसे कुछ परामर्श करना है। मैं विवश हो गई हूँ। दुर्ग में खाद्य सामग्री बहुत कम रह गई है और मुझे यह संकोच हो रहा है कि आपकी अतिथि सेवा कैसे की जाए। अब कल से हम लोग एक मुट्ठी अन्न लेंगे,आप लोगों को दो मुट्ठी उस समय तक मिलेगा जब तक दुर्ग में अन्न रहेगा। आगे ईश्वर मालिक है।’

मलिक काफूर की आंखों में आँसू भर गए। उसने कहा- “राजकुमारी, मुझे यकीन है कि आप बीस किलों की हिफाजत कर सकती हैं।”

“हां, यदि मेरे पास हो तो।”

राजकुमार चली गई।

अठारह सप्ताह बीत गए। अलाउद्दीन के गुप्तचर ने आकर शाह को कोर्निस की।

“क्या राजकुमारी रत्नावती किला देने को तैयार है ?”

“नहीं खुदावंद, वहां किसी तरकीब से रसद पहुंच गयी है। अब नौ महीने पड़े रहने पर भी किला हाथ नहीं आएगा। फिर शाही फ़ौज के लिए किसी तालाब में पानी नहीं है। उधर रतनसिंह ने मालवे तक शाही सेना को खदेड़ दिया है।”

अलाउद्दीन हत-बुद्धि हो गया और महाराज से संधि का प्रस्ताव किया।

सुंदर प्रभात था। राजकुमारी ने दुर्ग-प्राचीर पर खड़े होकर देखा कि सारी शाही सेना डेरे-डंडे उखाड़ कर जा रही है और महाराव रतन सिंह अपने सूर्यमुखी झंडे को फहराते, विजयी राजपूतों के साथ, दुर्ग की ओर आ रहे हैं।

मंगल कलश सजे थे। बाजे बज रहे थे।  दुर्ग में प्रत्येक वीर को पुरस्कार मिल रहा था। मलिक काफूर महाराव के बगल में बैठे थे। महाराव ने कहा “खां साहब, किले में मेरी गैरहाज़िरी मैं आपको असुविधाएं हुई होंगी, इसके लिए आप माफ करेंगे। युद्ध के नियम कड़े होते हैं। फिर किले पर भारी मुसीबत थी। लड़की अकेली थी। जो बन सका, किया।”

काफूर ने कहा- “महाराज, राजकुमारी तो पूजने लायक है। मनुष्य नहीं, फरिश्ता है। मैं जन्म भर उनकी मेहरबानी को नहीं भूल सकता।”

महाराव ने एक बहुमूल्य सरपेच उन्हें दिया और पान का बीड़ा देकर विदा किया। दुर्ग में धौंसा बज रहा था।

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